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*सनातन संस्कृति में पंचांग का महत्व*

*सनातन संस्कृति में पंचांग का महत्व*

सनातन संस्कृति में पंचांग होता है , जिसे आप सभी ने कही न कही किसी सनातनी वैज्ञानिक अर्थात पंडित जी के पास देखा होगा, आज पश्चिमी देशों से कुछ शौधार्थी एक बात कर रहे है की पृथ्वी के एक क्षेत्र का समय दूसरे से अलग है, यदि हम अपने क्षेत्र के समय का पालन करते है तो हम कई समस्याओं से बाकी सकते है । जैसा कि भारत को  भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से देखे तो आज का भारत विश्व का सातवां बड़ा  देश है लेकिन भारत में हम एक ही Time Zone का पालन करते है , जिससे हमारी समस्याएं बड़ रही है।

आज इस विषय पर कुछ चर्चा करते है,यदि हम western calendar और ग्रीनविच टाइम को अलग कर सनातन धर्म के पंचांग को अपनाले तो कई समस्याओं से बचा जा सकता है। यह पंचांग बहुत ही वैज्ञानिक तरीके बनाया जाता है, एक विशेषता यह है की उस पंचांग को एक सीमित क्षेत्र को ध्यान में रख कर बनाया जाता है। सूर्य उदय एवं सूर्यास्त का समय क्षेत्र के अनुसार होता है । यहा तक की चौघड़िया , नक्षत्र , ग्रह एवं तारो के  उदय के समय की गणना उस क्षेत्र को ध्यान में रख कर की जाती है।

इसे बनाते समय तारे , नक्षत्र , घड़ी,पल की सटीक गणना की जाती है, जो की पूर्ण रूप से प्रमाणित होती है। 
पश्चिमी खगोलीय यंत्रों के अविष्कार के हजारों साल पहले सनातनी वैज्ञानिकों अर्थात ऋषियों ने काल की सटीक गणना कर दी। सौर मंडल के तारो एवं ग्रहों की सूर्य परिक्रमा करने की सटीक समय गणना कर दी गई।

सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण , पूर्णिमा, अमावस्या, सिंहस्थ , कुंभ, अर्ध कुंभ, सबकी गणना सटीक कर दी , बिना किसी उपकरण के। खगोलीय उपकरणों के अविष्कार के हजारों साल पहले से ही पंचांग की गणना से हमे सौर मंडल के ग्रहों जैसे बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, चंद्र, यहां तक की सूर्य का राशि परिवर्तन भी सटीक बता दिया गया था। दिन में दिशा एवं प्रहार का बोध सूर्य की आकाशीय स्थिति, एवं रात्रि में तारा मंडल से दिशा एवं प्रहार का सटीक विश्लेषण कर दिया गया। 

ये वो विज्ञान है , जिसे समझने ले लिए ज्योतिष, वास्तु, एवं सनातन संस्कृति में विश्वास करना होगा।  
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डा. आशुतोष व्यास 
उज्जैन ( म.प्र.)