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अधिक मास के दौरान कई भक्त सख्त नियमों का पालन करते हैं, लेकिन इसका गहरा तर्क अक्सर छिपा हुआ लगता है। दरअसल, अधिक मास का खगोलीय आधार सूर्य और चंद्रमा की सटीक गति से जुड़ा हुआ है।
सरल शब्दों में समझें तो —
चंद्रमा हमारे तिथि और मास तय करता है, जबकि ऋतुएँ सूर्य के अनुसार चलती हैं। धीरे-धीरे चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से पीछे रह जाता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, ताकि चातुर्मास, श्रावण और कार्तिक जैसे पर्व सही ऋतु में बने रहें।
इस गाइड में हम पहले अधिक मास के कारण को समझेंगे और फिर पूजा, व्रत और दान के स्पष्ट तरीके साझा करेंगे।
BookYourPandit के साथ आप घर, मंदिर या ऑनलाइन—हर जगह सरल और विश्वसनीय पूजा व्यवस्था पा सकते हैं।
हिन्दू पंचांग की मूल बातें
अधिकांश हिन्दू पंचांग सूर्य और चंद्रमा दोनों पर आधारित होते हैं।
चंद्र मास और तिथि
एक चंद्र मास, चंद्रमा के चक्र पर आधारित होता है।
तिथि सूर्य और चंद्रमा के कोण के अनुसार बदलती है।
मुख्य बातें:
एक मास दो पक्षों में बंटा होता है
शुक्ल पक्ष → अमावस्या के बाद चंद्रमा बढ़ता है
कृष्ण पक्ष → पूर्णिमा के बाद चंद्रमा घटता है
अलग-अलग क्षेत्रों में मास की शुरुआत अलग हो सकती है।
सूर्योदय के अनुसार तिथि बदलने से पंचांग में समय में अंतर दिख सकता है।
सौर वर्ष और राशि परिवर्तन
सौर वर्ष सूर्य के 12 राशियों में भ्रमण पर आधारित है। हर राशि परिवर्तन (संक्रांति) महत्वपूर्ण माना जाता है। पारंपरिक ज्योतिष गणना अत्यंत सटीक होती है
आधुनिक पंचांग ऐप भी इसी खगोल विज्ञान का उपयोग करते हैं
12 चंद्र मास मिलकर सौर वर्ष से छोटे होते हैं, यही कारण है कि अधिक मास की आवश्यकता पड़ती है।
अधिक मास क्यों आता है? (सरल खगोलीय कारण)
चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से छोटा होता है। हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर बनता है। कुछ वर्षों में यह अंतर लगभग एक महीने के बराबर हो जाता है। तब एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है — जिसे अधिक मास कहते हैं।
यह ठीक वैसे ही है जैसे अंग्रेजी कैलेंडर में लीप ईयर होता है, लेकिन यहाँ एक दिन नहीं, पूरा महीना जोड़ा जाता है।
पंचांग में अधिक मास कैसे तय होता है?
पंचांग बनाने वाले:
एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक का समय देखते हैं
सूर्य की स्थिति से तुलना करते हैं
👉 यदि उस पूरे चंद्र मास में सूर्य राशि नहीं बदलता,
तो वह महीना अधिक मास बन जाता है।
अधिक मास का खगोलीय और आध्यात्मिक महत्व
अधिक मास केवल गणित नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अवसर भी है।
• चंद्रमा → मन का प्रतीक
• सूर्य → आत्मा का प्रतीक
दोनों का संतुलन ही जीवन में सामंजस्य लाता है।
इसलिए अधिक मास को अतिरिक्त साधना का समय माना गया है। यदि अधिक मास न हो तो त्योहार अपनी ऋतु से हट जाते।
अधिक मास के कारण:
चैत्र नवरात्र → वसंत में
श्रावण → वर्षा ऋतु में
दीपावली → शरद ऋतु में
यह खेती और जीवन चक्र को भी संतुलित रखता है।
ऋत (Cosmic Order) और अनुशासन
अधिक मास का नियम ऋत (cosmic order) को दर्शाता है।
इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है,
जिसमें विशेष रूप से जप, दान, व्रत का महत्व बढ़ जाता है।
भारत में अधिक मास की परंपराएँ
पूरे भारत में अधिक मास समान है, लेकिन पालन के तरीके अलग-अलग हैं।
उत्तर और पश्चिम भारत
• कथा, सत्संग, जप
• विष्णु और कृष्ण भक्ति
महाराष्ट्र और दक्षिण भारत
• व्रत और संकल्प
ज्योतिष और खगोलीय ज्ञान का महत्व
अधिक मास के नियम और पालन
इस महीने में क्या करें:
• रोज़ पूजा और जप
• गीता / भागवत पाठ
• दान और सेवा
क्या न करें:
• विवाह
• गृह प्रवेश
• बड़े नए कार्य
घर पर सरल पूजा विधि
• संकल्प लें (जप, व्रत या दान का लक्ष्य तय करें) दैनिक पूजा, आचमन, गणेश पूजन, विष्णु/कृष्ण पूजा
• पाठ गीता, विष्णु सहस्रनाम, भागवत
• आरती और प्रसाद
BookYourPandit कैसे मदद करता है
Verified Pandits
• घर या ऑनलाइन पूजा
• संपूर्ण पूजा सामग्री सूची
• तिथि और मुहूर्त मार्गदर्शन
•
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
अधिक मास कितनी बार आता है?
लगभग हर 32–33 महीने में एक बार।
क्या यह शुभ है?
👉 यह अत्यंत आध्यात्मिक रूप से शुभ है
लेकिन बड़े कार्य टालने की परंपरा है।
क्या विवाह हो सकता है?
सामान्यतः नहीं। जरूरत हो तो पंडित से परामर्श लेना चाहिए।
किस देवता की पूजा करें?
भगवान विष्णु, भगवान कृष्ण, तुलसी पूजा
निष्कर्ष
अधिक मास, खगोल विज्ञान और भक्ति का अद्भुत संगम है।
• चंद्रमा → तिथि
• सूर्य → ऋतु
• अधिक मास → संतुलन
यह महीना हमें अतिरिक्त समय देता है:
• जप के लिए
• दान के लिए
• आत्म चिंतन के लिए
👉 सही विधि और मार्गदर्शन के लिए BookYourPandit के साथ अधिक मास का पालन करें —
पूरी श्रद्धा और स्पष्टता के साथ।